Wednesday, September 9, 2009

अब धर्म निरपैक्छ्ता को खतरा नहीं



महाराष्ट्र के सांगली जिले मे गणेश जी विसर्जन नहीं हो पा रहा है मूर्तिया खंडित की जा रही है , मिराज ओर जिले के दूसरे हिस्सों मे सांप्रदायिक तनाव है हिन्दू आस्था पर चोट की जा रही है पर कही कोई खबर नहीं कोई विरोध नहीं . सांप्रदायिक तनाव का कारण है की किसी गणेश पंडाल मे शिवाजी महाराज के हाथो से अफज़ल खान के वध की प्रदर्शनी लगी हुई थी , ये अफज़ल वर्तमान का अफज़ल नहीं शिवाजी के समय का है



महाराष्ट्र मे इतना सुब कुछ हो गया पर कही कोई हल्ला नहीं , गोपीनाथ मुंडे को एयर पोर्ट पर रोकने पर हुऐ हल्ले पर जरूर एक दिन खबर दी गई पर कही के उल्लेख नहीं था की सांप्रदायिक तनाव के चलते गणेश विसर्जन ही रुका हुआ है , ओर देखिये विवाद का विषय भी इतिहास की एक सत्य घटना . अब शिवाजी महाराज पर भी लोगो को आपति होने लगी ओर आपति की हद भी इतनी की हिन्दू आस्था पर ही चोट कर दी , गणेश मूर्तियों पर पत्थर उछाले गये
हिन्दू धर्म पर चोट से इस देश की धर्म निरपैक्छ्ता को बल मिलता है तभी तो न मीडिया मे ओर न ही तथाकथित धर्म निर्पैक्छ्ता के तैकैदारो को कोई परेशानी हुई , इन से मुझे कोई उम्मीद भी नहीं है पर भारत का आम आदमी - ये कब तक सोता रहेगा , महाराष्ट्र मे चुनाव है इस तनाव को भी हिन्दू संगठनो से जोड़ दिया गया , गणेश मंडलों को शिवाजी व् अफजल का पोस्टर लगाने पर नोटिस दिया गया , मुस्लिम वोटो के लिये शिवाजी द्वारा अफज़ल वध के पोस्टर हटा दिये गये ओर मूर्तियों पर पथराव को पुलिस देखती रही ताज्जुब कही कोई खबर ही नहीं

क्या हिन्दू की बात करने से इस देश की शांति भंग हो जाती है , सोचिये जरा यदि कुछ ऐसा ही किसी मुस्लिम या ईसाई आस्था पर हुआ होता तो देश की संसद से लेकर मीडिया ओर सड़क छाप धर्म निर्पैक्छ्ता के तैकैदारो का क्या हाल होता . ये केवल हिन्दू या मुस्लिम की बात नहीं है , सही ओर गलत मे अंतर की बात है , अफज़ल खान जैसे लोगो मे अपना नेत्रत्व तलाश करने की बात है , फिर भी इस देश मे अल्पसंख्यक "खतरे" मे है

Sunday, August 23, 2009

"मेरे घ्रर आई एक नन्ही परी"


मेरी बिटिया , बहुत इंतजार कराया है इसने पर कहते है ना कि इंतजार का फल मीठा होता है , इसके नन्हे कदमों ने पूरे परिवार मे खुशिया बिखेर दी है , बिटिया के रूप मे लक्ष्मी जो आई है ( इसकी पडदादी ने इसको इसी नाम से पुकारा है )

Thursday, August 13, 2009

तिरंगे कि दूर्दशा




(ये फोटो दिल्ली जोधपुर इंटरसिटी ट्रेन मे लिया गया है , ओर ज़रा खिड़की के पास टके थैले को देखिये , जी हाँ ये तिरंगा है हमारा राष्ट्रीय ध्वज )

राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे कि इस दशा पर आंसू आ रहे है उस से ज्यादा इस उन्नत ओर आगे बढ़ रहे देश के हालात पर , लाखों शहीदों कि कुर्बानियों पर मिली इस आज़ादी मे हम अपने लोगों को मूलभूत न तो बाते बता पाये ओर न ही मूलभूत सुविधा - शिक्छा दे पाये , मुझे इस ओरत से कोई नाराजगी नहीं है उस को तो तिरंगे ओर दूसरे कपडे मे कोई अंतर ही नहीं मालूम , पर अफ़सोस है ट्रेन के टीटी , रेलवे पुलिस के जवान ओर सामने कि बर्थ पर बैठे भी पढे लिखे लोगों पर जो तिरंगे कि दुर्दशा को देख उसे एक प्रदर्शनी बनाये हुई थे , किसी ने उस अनपढ़ महिला को टोका भी नहीं , जैसे ही उस को बताया उसने इस को खली कर दूसरे थैले मे रख भी लिया


पर यदि आज़ादी के 60 साल बाद भी हमारी जनता इस से अनभिज्ञ है तो कोन दोषी है , देश का नेत्रत्व करने वाले नेता - अफसर या आप ओर हम , हम चाँद ओर मंगल , तेजी से बढती अर्थव्यवस्था , कि बात करते है पर इस फोटो को देख कर सोचिये जरा ,कि क्या हम वाकई आगे बढ़ रहे है , क्या हम ज्यादा ही आजाद हो गये है या हम आज़ादी का पर्व मनाने का हक रहते है ??

" स्वाधीनता दिवस कि सभी को शुभकामना ओर शहीदों को नमन , साथ ही भरोसा कि देश शहीदों के सपने वाला देश जरूर बनेगा "

Tuesday, August 11, 2009

"राष्ट्रीय राजमार्ग पर आप का स्वागत है "

मार्ग भी कई तरह के होते है न , गाँव की पगडण्डी -सिंगल सड़क - राज्य सरकार के राजमार्ग ओर राष्ट्रीय राजमार्ग वैसे ही जैसे गाँव - क़स्बा -जिला ओर राजधानी , अब देश की वर्तमान स्थिति की चलते गाँव - क़स्बा -जिला मे सुविधाओ की तो उम्मीद छोड़ दीजिये पर राजधानी मे तो कुछ उम्मीद कर ही सकते है , पर वहां भी हाल बेहाल मिले तब ? राष्ट्रीय राजमार्ग पर उम्मीद की जा सकती है बढ़िया सड़क कि , वैसे सड़क है तो उस मे गड्ढा तो होगा ही , कही कही गड्ढो मे सड़क भी , लालू भी कभी पटना की सडको को ....के गालो की तरह बनाना चाहते थे पर बात केवल बात बन कर रह गई

अभी NH 8 पर रेवाडी से जयपुर जाना हुआ , राष्ट्रीय राजमार्ग की सुविधा के उपभोग के लिये आने जाने के लिये करीब 250 रुपे का टोल टैक्स भी दिया , पर गड्ढो से बचने के लिये अपनी कार की स्त्त्येरिंग को बार बार घुमाता ही रहा , नजर आस पास की गाडियों के आलावा सड़क के संभावित गड्ढो पर भी टिकी रही , जाते वक्त तो हालात को फिर भी कुछ टीक थे है पर जयपुर से वापसी के वक्त " है भगवान ". लग रहा था की किसी गाँव की सड़क पर है , वैसे गावों कि सड़क इस ज्यादा अच्छी है , इतने भारी टोल टैक्स का मतलब केवल सरकारी डंडे से वसूली लगा ,जयपुर से दिल्ली राजमार्ग दो राजधानियों को जोड़ने वाला - दो पर्यटक राजधानियों को जोड़ने वाला मार्ग है साल मे लाखों देशी विदेशी पर्यटक इस मार्ग पर सफ़र करते है .. . पर इस की हालात देख कर बहुत दुःख हुआ .. कहते है सड़क देश का आइना है , राजमार्ग की हालात देख इस आइने से क्या देखे समझ नहीं आता


जान का क्या है भाई जल्दी है , ऊपर की फोटो भी राष्ट्रीय राजमार्ग की ही है - करीब 100 की स्पीड पर चल रही इस जीप मे ये लोग पीछे लटक रहे है , यात्रियों को न तो अपनी सुरक्छा की चिंता है ओर न ही जीप चालको को पुलिस का भय .. ओर न ही पुलिस को अपने काम की याद .


वैसे राजमार्ग पर लगा बोर्ड अब भी कह रहा है "राष्ट्रीय राजमार्ग पर आप का स्वागत है "

Thursday, July 30, 2009

अब कहाँ है "इस" अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता के पैरोकार

सविधान मे बड़ा प्यारा सा नाम है अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता , जिसे जो मन मे आये वही व्याख्या कर ले , कभी हुसैन साहब हिन्दू आराध्य देवियों के नग्न चित्र बनाये या गुजरात मे कोई छात्र कला के नाम पर हिन्दू आराध्यों के अश्लील चित्र बनाये तो इन्हे अभिवक्ति कि स्वतंत्रता , कला के विकास का प्रवर्तक बताया जाता है . इनका विरोध करने वालो को साम्प्रदयिक बता इन " महान " कलाकारों के समर्थन मे देश के बहुत से तथाकथित कलाकार बडे झंडे उठा लेते है , पर अभी जब एक पुस्तक मे मोहमद साहब का एक काल्पनिक चित्र प्रकाशित होने पर प्रकाशक को गिरफ्तार किया गया ( लिंक देखे) तो ये कला समर्थक ओर धर्मनिर्पेछ्ता के पैरोकार पता नहीं कहा गायब है , अब क्यूँ इन कि अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता गायब है , हर धर्म कि अपनी मान्यतायी है ओर उनका सम्मान भी होना चाहिये पर एक ही चीज पर ये विरोधाभास क्यूँ , क्या ये लाठी का जोर है ???????
http://www.rajasthanpatrika.com/national/detail/?nid=4932

Monday, July 20, 2009

जगह ढूंढती संवेदनाये

कल घर से ट्रेन मे वापस आ रहा था , हजारो करोड़ के मुनाफे वाली ट्रेन मे यात्रियों का हाल देख मुनाफे पर शक होता है , जनरल बोगी की तो बात छोडिये रिजेर्वेशन बोगियों मे भी जगह तलाशना मुशिकल है , खैर जुगाड़ लगा ही लेते है तो ऊपर की बर्थ पर सामान इधर उधर कर अपनी तो व्यवस्था हो गई, अपनी आदत के चलते जगह मिलते ही एक किताब निकाल कर उस मे लग गया , खैर जी छोडिये मुद्दे पर आते है .

कहते के कि महिलाओ को महिलाओ कि बड़ी चिंता होती है ( आज तक मे इस को समझ नहीं पाया हूँ ) , एक दूसरे के लिये बड़ी संवदेनशील होती है , पर कल इस सफ़र मे जो देखा को समझ नहीं आया . भीड़ के चलते मैं तो ऊपर चढ़ गया था पर नीचे कुछ हल्ला देख नीचे ध्यान गया , नीचे कि बर्थ पर कुछ महिलाओ का ही रिजेर्वेशन था , एक बर्थ पर दो दो जेंटल लेडी ही बैठी हुई थी , महिलाये थी इसीलिये कोई भी वहां जगह नहीं मांग रहा था , पर एक महिला यात्री जिस कि गोद मे एक बच्चा भी था , उस भीड़ मे उन महिलाओं से वहां जगह मांग बैंठी , उस कि उम्मीद गलत भी नहीं थी वो बार बार कह रही थी कि उस को अगले स्टेशन पर उतरना है , पर ताज्जुब हुआ उन पड़ी लिखी महिलाओं कि संवेदनाओ वो देख कर , साफ साफ शब्दों मे उस महिला को जगह देने से मना कर दिया , आमने सामने कि तीन बर्थ पर 6 महिला ओर एक बच्चे को गोद मे लिये हुई एक महिला ,पर शर्म उस को बैठने कि जगह नही मिली कारण , वो महिलाये आराम करना चाहती थी शाम के सात बजे .वहां खडे कितने ही लोगों ने उन से उस महिला को जगह देने का आग्रह किया पर सब व्यर्थ था , उस महिला ने भीड़ मे ही आगे निकाल कर जगह तलाश करना उचित समझा , आगे उसे तुरंत जगह भी मिल गई .

इतना होने के बाद मेरा ध्यान भी नीचे ही लग गया , देखा कि कुछ महिला समितियों के लैटर हैड नजर आये , बातों पर ध्यान दिया तो सुना कि ये सभ्रांत महिलाये महिला समितियों से जुडी थी ओर दिल्ली मे किसी महिला सम्मेलन मे हिस्सा लेने जा रही थी . अब आगे क्या कहै , देश मे समलैंगिको के लिये संवेदनाये स्थापित कि जा रही है पर शायद मानवीय संवेदनाये खुद अपनी जगह तलाश रही है

Thursday, July 16, 2009

दीपावली मनाओ , वो केवल भारत आ रही है ..

"भारत सरकार बहुत खुश है , अपनी विदेश नीति की सफलता पर आनंदित है आखिर अमरीका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन केवल भारत आ रही है पाकिस्तान नहीं जा रही है . अमरीका अब भारत को पाकिस्तान से ज्यादा महत्व दे रहा है "

जब भारत सरकार के प्रवक्ता की टिपण्णी पड़ी ओर मीडिया मे इस की कवरेज देखि , तो सोचा की कही हम अमरीका के उपनिवेश तो नहीं है ,, जहाँ महामहीम आ रहे हों ,वो पाकिस्तान नहीं जा रही तो भी ये भारत सरकार को अपनी सफलता दिख रही है , क्या पता इसी ख़ुशी मे भारत सरकार दिवाली मनाने का हुक्म जारी कर दे , पर जब अमरीका के राष्ट्रपति भारत आयेगे तब सरकार ओर मीडिया क्या दंडवत प्रणाम करेगी

.या विदेश मंत्रालय के नोकरशाह बच्चो का खेल तो नहीं खेल रहे है ,जहाँ एक बच्चा दूसरे से बोले की देख देख पड़ोस वाली आंटी ने मुझे प्यार किया तुझे नहीं ......

Tuesday, July 7, 2009

हिंदी नै पूछा , अनाथ क्युं हूँ मै

अभी कल एक पुस्तक की दुकान मे कुछ लेने गया तो लगा की हिंदी पुस्तकों की दुकान मे हिंदी पुस्तकों के बीच मे रखी अंग्रजी की कुछ पुस्तके बड़ी इठला रही है , जैसे देशी लोगो के बीच मे कोई सूट-बूट पहने कोई परदेशी बैठा हो , दुकान मे सबसे बढ़िया जगह भी इन्ही को मिली हुई थी , खैर जो लेना था वो लेकर मे तो बाहर आ गया पर लगा की कोई मेरा पीछा कर रहा है , रुका और देखा तो एक परछाई सी नजर आई , नजदीक आने पर एक साडी पहने एक नारी नजर आई , चहरा बड़ा तेजपूर्ण था , किसी सभ्रांत घर की सदस्य दिख रही थी पर कपड़ो और दशा से एक पीड़ित नारी लग रही थी

मैं कुछ पूछता , उस से पहले उसने कहा की "मेरे कई संताने हैं , कोई डॉक्टर , कोई वेज्ञानिक , जज , मंत्री , नेता , उद्योगपति , कर्नल मेजर , लक्ष्मी पुत्र तो कोई सरस्वती पुत्र तो कोई धरती पुत्र , कोई कलाकार तो कुछ समाजसेवी भी मेरे कुनबे मे है जो हर विषय पर झंडा बुलंद रखते है " ,
इतना सुनने पर सीधा सा मेरा प्रशन था " फिर आप का ये हाल , क्या हुआ क्या घर का रास्ता भूल गई है क्या या कोई ओर समस्या है "

उत्तर देने से पहले वो हंसी के साथ रोने लगी . मेरे पूंछने पर अपने आंसू थाम कर उसने कहा " हंसी , मेरे गर्व की प्रतीक है मेरा परिवार इतना बड़ा और खुशहाल है की हर माँ को गर्व होगा , इतने बेटो बैटियों के साथ मेरी कई बहने भी मेरे साथ एक ही घर मे रहती है , मेरे और मेरी बहनों के लायक संतानों नै हमे इतना कुछ दिया भी है की उस पर हम को नाज है , हर रिश्ते को नाम और इज्जत हम नै दी है "

फिर रोई क्युं आप ..एक गहरी साँस लेने के बाद बोली " इतना होने पर भी आज मे अनाथ हूँ ,अपने ही घर मे एक शरणार्थी की तरह जिंदगी निकाल रही हूँ , घोषित प्रमुख आज भी अपने कुनबे की मे ही हूँ पर स्थिति एक किरायदार की हो गई है " इतना बोल वो चुप हो गयी , मामले को गंभीर जान मुझे भी अब वहा रुकने को मजबूर होना पड़ा . अंदर का समाजसेवी जगने लगा मैं कुछ पूछता उस से पहले उस नै खुद ही कहा

" मै हिंदी हूँ ... इस देश की राज भाषा "

गली के सन्नाटे मे भी लगा की कोई करफू लग गया , क्या करू - क्या कहूँ ,समझ से परे था , वो भी जानती थी की मै यदि कुछ बोला तो झूटी तसल्ली ही दूंगा , इस लिये बिना मुझे मोका दिये बिना वो ही बोलने लगी " इस देश मे हजारो सालो से संस्कृत की कोख से सैंकडो भाषा निकली ओर इस देश मे बहने बन कर रही , कभी मेरी खास बहन उर्दू राजभाषा बनी , तो कही तमिल या ओर कोई पर कभी किसी को कोई समस्या नै थी , पर आज हमारी जो हालत है वो ..... .........?

" देश जब आजाद हो रहा था तो मुझ को लगा की अब अपने देश मे मे बिना किसी भेदभाव के पलूंगी , पर आजाद भारत मे प्रधानमंत्री नहरू जी नै अपने पहले एतिहासिक भाषण मे ही मेरी उपेछा कर अंग्रजी मे अपना भाषण दिया , तब ही आज़ादी के मेरी ख़ुशी पर एक प्रशन लग गया था , संविधान की भाषा मे नहीं थी , नोकरशाही तो अब भी अंग्रजी को ही गले लगाय हुई थी , लोकतंत्र आया तो मेरे नेता पुत्रो नै हम बहनो को ही अपनी सीढी बना ली , सैंकडो सालो से तमिल के साथ मे देश मे रह रही थी , आज मुझ को इस पर ही खतरा बता दिया , पराई भाषा स्वीकार थी पर हिंदी नहीं "
गहरी साँस से हिंदी फिर बोली " मुझे या मेरी अन्य बहनों को अंग्रजी से कोई समस्या नहीं है , पर क्या मुझे मेरे अपने घर मे मेरा स्थान नहीं मिलना चाहिये" मैने समझाने का प्रयास करते हुई कहा की -. देश के नेता ओर नोकरशाही कहती है इतना बड़ा देश - इतनी सारी भाषाओ मे मैं काम नहीं कर सकती - सेतुबंध नहीं हो सकती इन सब के लिये अंग्रजी चाहिये . इतना सुन गुससे मे तेज आवाज़ मे वो बोली " समझ नहीं आती मुझे ये बात , आज़ादी से पहले या अंग्रजी के देश मे आने से पहले क्या इस देश मे काम नहीं होता था , या देश मे उत्तर का बन्दा क्या द्क्चिन मे नहीं जाता था या देश मे व्यवसाय या समर्धि नहीं थी , शायद इतनी थी की देश को लूटने लूटेरे आ गये , फिर आज देश मे काम देश की भाषा मे कुन नहीं . पचास साल मे अंग्रजी को गले लगा ओर हम को छोड़ कर कितना विकास कर लिया '"

उस की सुन कर मै बोला की चिकित्सा , विज्ञानं जैसे विषय केवल अंग्रजी मे हो सकते है , विश्व व्यवस्था मे अंग्रजी के आलावा किसी ओर भाषा मे काम नहीं हो सकता हम तुम से चिपक कर ओर अंग्रजी को छोड़ कर अपना विकास नहीं रोक सकते है , तुरंत उस का जो जबाब आया जिस का उत्तर मेरे पास नहीं था , वो बोली .. " अच्छी बात है पर रूस , चीन , फ्रांस , जापान जैसे देशो मे क्या इन विषयों पर पढाई नहीं होती है या ये देश विश्व व्यवस्था मे कोई जगह नहीं रखते है "

" आज भी इस देश मै पैसा हमारे माध्यम से कमाया जाता है , पर हमे हमारा स्थान नहीं मिलता , हिंदी फिल्म उद्दोग कमाता हिंदी से है पर बोलता अंग्रजी मै है , जज निर्णय भारतीयों के लिये करता है पर भाषा अंग्रजी है , उद्दोग हमारे लोगो के बीच चलता है पर काम अंग्रजी मै होता है , नेता वोट भारतीय भाषा मे मांगता है पर मंत्री और सरकार केवल अंग्रजी मै बोलती है , विज्ञापन मै अंग्रजी , रोजगार मै अंग्रजी ,हर सरकारी दफ्तर - कागज पर लिखा होता है की हिंदी मै काम करने पर स्वागत है पर हिंदी भाषी को हिराकत से देखा जाता है ,"

हिंदी की सुन कर मै चुप था , आगे उस नै जो कहा उस को सुन कर शायद आप भी . हिंदी बोली " ओर भी बहुत कुछ कह सकती हूँ पर अपने बच्चो की ज्यादा क्या शिकायत करू , शायद किस्मत मेरी ही ख़राब है , अंग्रजी विश्व मै इस लिये फैली की उस के बच्चो नै उस के लिये काम किया , जहा वो गये अंग्रजी को फैलाते गये ,रूस -चीन -फ्रांस -जापान की भाषा आज भी अपने देश की राज ओर जन भाषा है , इन देशो का वासी न केवल अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान के लिये जागरूक है बल्कि अपनी हर चीज पर गोरव भी करते है ,, पर हमारे यहाँ सब कुछ उल्टा है बात राष्ट्रीय स्वाभिमान की करेगे पर ,काम दूसरा करेंगे .. गौरव के नाम पर भाषण भी देंगे तो दूसरी जबान मै ....... क्या देश आजाद हो गया है सोचो जरुर ओर एक बात जो देश ओर देशवाशी अपनी भाषा अपनी जबान पर गौरव नहीं कर सकते है , काम नहीं कर सकते है वो देश कभी अपनी जड़ो से जुडा नहीं रह पायेगा ओर न अपना स्थान बना पायेगा , देश मै हमेशा 2 वेर्ग रहेगे एक अंग्रजी बोलने वाला ओर दूसरा न बोलने वाला ओर यही वेर्ग देश मै आर्थिक भेद के वेर्ग बनेगे , और शायद बन भी चुके है , शायद अभी मेरे देशवासियों मे से गुलामी गई नहीं है इसलिये ही अपने घर मे मे अनाथ हूँ - "

उस के आखरी शब्दों से मुझे देश की हालत का चित्र नजर आ गया , बढ़ता आर्थिक भेद नजर आने लगा , आँखों के सामने और अंधेरा नजर आया , जब तक संभालता खुद को तब मुझ को तो सावधान कर वो नारी तो कही अंधरे मे गुम हो गई , पर उसके प्रश्न उत्तेर की प्रतीछा मै है ,यदि आप के पास है तो बताये ताकि अगले बार जब वो मिले तो मैं उस को बता सकु

Monday, June 29, 2009

कोई बचाये इन नकलचियों से

अभी ज्यादा दिन नहीं हुऐ है मुझे ब्लॉग पर आये हुऐ और ज्यादा कुछ लिखा भी नहीं है , पर पता नहीं ये भाई साहब कहा से मेरे पीछे लग गये , जनाब नै मेरे दो लेख , अपने नाम से अपने ब्लॉग पर डाल दिया , ये तो धन्यवाद " हिंदी ब्लॉग टिप्स " का जहाँ जाने पर पता लगा की मेरे दो लेख भी चोरी हो गये है , जनाब नै उसी दिन अपना हाथ साफ किया है , पर क्या करे भाई साहब समय इन के हाथ मे नहीं है , टाइम नहीं बदल पाये
जनाब का नाम शिवम् मिश्रा है और मैनपुरी उत्तर प्रदेश से है , बुरा भला के नाम से इन का ब्लॉग है ,

मेरा एक लेख है " प्रधानमंत्री जी , क्या आप को नींद आ रही है "
http://burabhala.blogspot.com/2009_05_01_archive.हटमल

और दूसरा है " दर्द प्राइवेट नोकरी का "
http://burabhala.blogspot.com/2009/06/blog-post_06.html?showComment=1246282288837#
ब्लॉग पर नया हूँ , आदरणीय पाठक कृपया बताये की इस का क्या समाधान है .


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Monday, June 22, 2009

हाँ मै हिन्दू हूँ


हाँ मै हिन्दू हूँ , मुझे गर्व है आदि सनातन धर्म का अनुयाई होने पर , मुझे गर्व है की मै विश्व की सबसे उदार , सहनशील और मात्रत्व भावः से विश्व बंधुत्व और हर प्राणी के हित की बात करने वाली इस महान सभ्यता का निवासी हूँ , और इस पर गर्व करते वक्त मुझे बिलकुल भी भय नहीं है कोई मुझे साम्प्रेदायिक कहै या संकुचित . मै हिन्दू हूँ ,
ताजुब होता है ना ,जब कोई इस धर्म को हिन्दू , सनातन , वैदिक या और किसी नाम से पुकारता है , यही से इसकी खूबसूरती चालु होती है , किसी भी धार्मिक पुस्तक मे हिन्दू शब्द भी नहीं है , फिर भी ये धर्म हिन्दू के नाम से जाना जाता है , कभी सिन्धु के पार रहने वालो को हिन्दू कहा जाता था और कभी क्या , कुछ सालो पहले तक हर भारतवासी को हिन्दू के नाम से ही जाना जाता था , ये वो परंपरा है जिस का नामकरण इस भूभाग से हुआ है , ये वो धर्म है जहाँ धर्म का अर्थ कर्त्तव्य पालन से है .
मै जानता और मानता भी हूँ की मेरे धर्म मे काफी बूराइया भी प्रवेश कर गई है , फिर भी मै गर्व करता हूँ की मै हिन्दू हूँ , मेरा धर्म अपनी बुराइयों पर चर्चा करने उन पर प्रश्न उठाने और उन्हे दूर करने का प्रयास करने की भी इजाजत देता है ,हाँ यहाँ मेरा मत बड़ा स्पष्ट है की ये बूराइया मूल धर्म मै नहीं बल्कि समय के साथ इसमे शामिल हुई है ( आगे की कडियों मे मै इस पर भी आऊंगा )
धर्म की सीधी सी परिभाषा है अपने कर्तव्यो की पालना , एक संतान के लिये माँ और पिता , एक विद्यार्थी के लिये गुरु , राजा के लिये देश और प्रजा किसी भी ईश्वरीय आराधना से पहले माने गये है , यदि हम अपने मूल कर्तव्यों की ही पालना करलें तो भी हिन्दू धर्म के अनुयाई के रूप मे हम चल सकते हैं .
ये मेरा धर्म कला , विज्ञान , स्वास्थ्य ( आयुर्वेद , योग ), गीत - गायन , शस्त्र विद्या ,नगर स्थापत्य , जैसे विभिन् गुणों और मानव विचार की हजारो विचारधाराओ को अपनी गोद मे फलने फूलने का मोका देता है
ये बहु देव , बहु पुस्तक , बहु विचारधारा का धर्म माना जाता है ,, काफी लोग इस पर इस धर्म की आलोचना भी करते है .. पर मे इसे जीवंत धर्म का सबसे बड़ा प्रमाण मानता हूँ , धर्म की साधना का मतलब इश्वर तक पहुचना है और मेरे धर्म का मत है की वो परमसत्ता इतनी उदार , विशाल ह्रदय है की जिस नाम से , जिस विधि से , जिस रूप मे हम उस को पुकारे वो हम को अपना लेता है , वो इतना निरंकुश या तानाशाह नहीं है अपने एक ही नाम , एक ही भाषा , एक ही विधि से हमारी पुकार सुनता हो , मै चाहूँ तो निराकार या साकार रूप मै , पुरुष रूप मै या स्त्री रूप मै , जीवंत गुरु या ग्रन्थ गुरु रूप मै , प्रकर्ति मे या ध्यान , मे उस परमपिता को पुकार सकता हूँ , माध्यम चाहे विधिविधान से पूजा हो , तप हो , गीत हो संगीत हो या मात्र अपने मूल कर्तव्यो की पालना हो ..
इसी लिये ये सनातन है , आदि अनादी है और जीवन्त धर्म है .

Sunday, May 31, 2009

प्रधानमंत्री जी , क्या आप को नींद आ रही है ?

"खुला पत्र प्रधानमंत्री के नाम"

माननीय प्रधानमंत्री जी ,
मै जानता ही प्रधानमंत्री जी , आप बडे संवदनशील है , कई बातो पर आप को नींद नहीं आती है , अच्छी बात है कि आप इस बात को देश कि जनता से बाँट भी लेते है . पर पता नहीं चल पा रहा ही ऑस्ट्रेलिया मे भारतीय छात्रों पर लगातार हो रहे हमलो के बाद आप को नींद आ रही है या नहीं .? समझ सकता हूँ कि चुनाव कि थकान और अपने मंत्रिमंडल के गठन कि सिरदर्दी से आप अभी अभी उबरे है , नींद कि आप को जरूरत है , पर क्या करू ऑस्ट्रेलिया मे अपने भाइयो पर हो रहे हमलो से मै बड़ा उदास और चिंतित ही इसी लिये जानना चाहता हु कि क्या हजारो मील से आ रही ये आवाज़ आप कि नींद उड़ा पाई है या नहीं .

हर साल ऑस्ट्रेलिया जितनी जनसँख्या जिस देश मै पैदा होती है , वही देश आज अपने छात्रों को सुरक्षा नहीं दे पा रहा है , बार बार वहा से बयान आ रहे है कि सरकार से हमे कोई मदद नहीं मिल रही है पर कुछ बयानों के अलावा किसी मदद का कोई अहसास नहीं है ,कहाँ है हिंदुस्तान के नवनिर्वाचित युवा सांसद , मंत्री और युवा राजनीती के तथाकथित " नेता " राहुल गाँधी और इन कि सरकार , क्या हमारे छात्रों कि आवाज़ इन्हे सुनाई दे रही है .

प्रधानमंत्री जी , नींद से जागिये और इन छात्रों के बारे मे भी सोचिये , लंकाई तमिलों पर आई समस्या पर आप अपने विदेश मंत्री , विदेश सचिव और सुरक्षा सलाहकार को लंका भेज सकते है , यहाँ तो हमारे अपने युवाओ पर हमले हो रहे है , अब बयानों से आगे बढ़ कर अपने विदेश मंत्री को कडे संदेशो के साथ ऑस्ट्रेलिया जाने का आदेश दीजिये ताकि इन छात्रों और इस देश कि जनता के साथ इन पर हमला करने वालो को लगे ही इन का भी एक देश है और उस देश मे एक सरकार है जो इस देश के हर नागरिक के बारे मे सोचती है और उन कि सुरक्षा करने मे भी समर्थ है .

आपका ही

Monday, May 25, 2009

" दर्द ,प्राइवेट नोकरी का"



सरकारी कर्मचारियों को देखकर बहुत जलन होती है। जरूर पिछले जन्म में बहुत पुण्य किये होंगे, जो सरकारी नौकरी मिली। पॉँच साल के अपने अनुभव से मैं तो ये कह सकता हूं। हमने बहुत पाप किए होंगे। सुबह 9 बजे से लेकर शाम तक जो हाल होता है उसके बाद तो राम रखे। बुजुर्ग कहते हैं कि "भाई पैसे बहुत पर पूरा तेल निकाल लेते हैं प्राइवेट नौकरी में" कभी पूरी बात सही थी पर अब केवल पीछे की शब्द ही सही रह गये है। पैसा तो नये वेतन आयोग के बाद फिर भाग्यशाली लोग ले गए। उपर से मंदी की मार आ गई। सोचता हूं कम से कम इस जन्म में तो कुछ पुण्य कर लू, जिससे अगला जन्म तो सुधर जाए।

भाई किसी की तो ज्यादा नहीं कह सकता, पर अपनी तो "बजा" रखी है। प्रमोशन के लिये 100 नाटक और काम की कमी नहीं ,जो तेरा काम है वो तो तू कर ही और जो तेरा काम नहीं वो भी तू कर। क्‍यूंकि तू ऑफिस का "मालिक" है हर काम तेरा ही है। आदत शुरु से ही खराब रही है( एएचएस से ही बिगड़ गयी थी ) ना किसी को कर नहीं सकते, सोचते हैं कि चल कुछ सीखने को ही मिलेगा अब भाई जब आदत अपनी ही खराब तो उसको भुगतना तो पडेगा ही !!

जब सेल्‍स में था तब ऑफिस की और जिमेदारी ले रखी थी, अब कुछ ज्यादा ही ! अभी मेरा ऑफिस नई बिल्डिंग मे शिफ्ट हो रहा है। बिल्डिंग ढूँढने, रेट फिक्स करने , दुनिया भर की अप्रोवल, बहुत सारे लीगल, फाइनेंस, रि शिफ्टिंग डिपार्टमेंन्‍टस में बात करो। इनके कागज पूरे करना। उफ़ . ट्रांसपोर्ट, कारपेंटर, बिजलीवाला ढूँढना है और पुराने मालिक से बना कर रखो। उसका क्लेम कम से कम रखना है। ऑफिस बदलने पर सरकारी विभागों को सूचना, लोकल प्रचार भर जरूरी है। ऐसा नहीं है कि इसके लिये अलग बन्दा नहीं है, है एक वो भी 60-70 ऑफिस पर एक। तो भाई हम को ही करना है, और ये सब कुछ करने की आखरी तारिख एक जून। नहीं हुआ तो हमारे लिये "प्रेम पत्र " और इन सब के अलावा ऑफिस तो है ही, सेल्‍स के टारगेट भी पूरे करने हैं।


करना सुब कुछ है पर प्रमोशन , भाई विचार चल रहा है , हो जायेगा ,चिंता भी मत कर और छोड़कर भी मत जा। वैसे बताता चलूं कि पिछले साल हर चीज में हम अपने रीजन मे नंबर वन थे पर प्रमोशन के लिये तरस गये।


भाई बताओ ना की अगले जन्म के लिये कौनसा पुण्य करूं कि सरकारी नौकरी मिले।
कोई जुगाड आपको पता हो तो टिप्‍पणी अवश्‍य करें !!!

Thursday, May 21, 2009

चुनाव परिणाम - प्रश्न कारण, ख़ुशी और उम्मीद

एनडीए की हार और यूपीए की जीत ने मन को उदास भी किया है, बहुत कुछ सोचने को मजबूर किया। चुनाव परिणाम काफी ज्यादा आश्‍चर्यजनक रहे। न एनडीए को अपनी इतनी बुरी हार का अंदेशा था और न ही कांग्रेस को इतनी सफ़लता की उम्मीद। फिर ये हुआ क्या, क्या जनता के अंदर कोई चुपचाप लहर चल रही थी जिसे कांग्रेस, बीजेपी और एक मतदाता के रूप में आप और हम महसूस नहीं कर पाए। फिर ऐसा क्या हुआ की परिणाम ऐसा आया।

कुछ प्रश्‍न सामने आए हैं।
1. क्या जनता सोचती है - जो सोचते है वो वोट नहीं डालते और जो नहीं सोचते वो वोट डालते है।
2.क्या ये डेमोक्रेसी की जीत है - तब शायद 75 फीसदी वोटिंग होती न की 50 फीसदी से कम।
3.क्या ये युवा वर्ग की जीत है - लगभग 50 सांसद युवा माने जा रहे है, इनमे से कितने आप-हममें से है, वो युवा वर्ग के प्रतिनिधि माने जाएंगे या पारिवारिक राजनीति के वारिस, मुझको तो कई बार ये लगता है ये प्रक्रिया छोटे छोटे रियासतों के युवराजों का राज्याभिषेक है।
4.क्या ये मुद्दों की जीत है- तब शायद महंगाई, 60 सालों में देश में हुआ विकास, अल्‍पसंख्‍यक समुदाय का विकास ( वैसे मैं बहुसंख्‍यक और अल्‍पसंख्‍यक के सिद्धांत को ही देश हित मे नहीं मानता), कालाधन विदेशों से भारत मे वापिस लाना, तीन लाख तक इनकम टैक्स से मुक्ति, देश की सीमाओं की सुरक्षा आदि मुद्दे देश को प्रभावित कर पाए या नहीं आप देखें ।
5.क्या ये नेतृत्व आधारित जीत है – आडवाणीजी और श्रीमती सोनिया-राहुल गाँधी मे समानता कैसे की जा सकती है, एक तरफ है 60 साल का राजनीतिक सफर व दूसरी तरफ है पारिवारिक विरासत को भोगने वाला वंश, जिसने आज़ादी मे दिए अपने पूर्वजों के योगदान को खूब भुनाया है। यदि मनमोहन सिंह जी की बात करें (व्‍यक्‍ितगत रूप से मैं इन की ईमानदारी और काबलियत पर शक नहीं कर रहा हूं) तो गाँधी परिवार के एक सीईओ से ज्यादा क्या भूमिका मानूं।
6.क्या ये धर्म निरपेक्षता की साम्प्रदायिकता पर जीत है- हम किस को साम्प्रदायिक और धर्म निरपेक्ष प्रतिनिधि मानते है, आखिर क्‍यों हिन्दू हित की बात करना साम्प्रदायिक और मुस्लिम व ईसाई हित की बात करना धर्म निरपेक्ष माना जाता है।

फिर आखिर ये क्‍यों हुआ, मुझे जो लगता है -
1.वोटिंग प्रतिशत का ऐतिहासिक रूप से कम होना
2.मुस्लिम और ईसाई वोटिंग, पूरी तरह से कांग्रेस के पक्ष मे गई (यूपी, आंध्र, केरल ) सपा, बसपा और कामरेडों को भी छोड़ दिया गया।
3.बीजेपी के वोटर व कैडर वोट डालने-डलाने के लिए नहीं निकले।
4.बीजेपी अपने मुद्दे जनता तक नहीं ले जा सकी, अपने असली मुद्दों की जगह नकारात्मक प्रचार उन को ले डूबा।

फिर भी मैं कुछ खुश भी हूं क्‍योंकि-
1.कांग्रेस को 200+ सीटें आने से एक स्थाई सरकार की उम्मीद जगी है।
2.लालू , मुलायम, मायावती, कामरेड, जया के हॉफ और पासवान व चौटाला के साफ होने से दबाब की राजनीति कुछ कम होने की उम्मीद है।
3.बीजेपी को अपनी नीति, कार्यशैली और नए नेतृत्‍व पर विचार करना होगा ।
4.इन परिणामों से शायद, सोचने वाला वर्ग वोट डालने के बारे मे भी सोचेगा।

खैर पॉँच साल तक इस सरकार को ही देश को आगे बढाना है, कुछ उम्मीद है मुझे -
1.गाँधी परिवार के सीईओ डॉ.मनमोहन सिंह जी पॉँच साल तक प्रधानमन्त्री बने रहेंगे, युवराज राहुल बाबा बीच मे ही नहीं टपकेंगे।
2.आतंकवाद को हिन्दू या मुस्लिम मे नहीं बताया जाएगा. अफज़ल को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर फाँसी की सजा मिलेगी ।
3.गैस के सिलेंडर बिना लाइन के मिलेंगे व घर का बजट महंगाई से नहीं बिगडेगा, शेयर मार्केट की "कालाबाजारी" बंद होगी।
4. हिन्दुतान की सम्पदा पर सभी भारतवासियों का हक माना जाएगा न की केवल मुस्लिम समुदाय का ( मनमोहन सिंह का पूर्व बयान याद रखें)।
5. बिना राज्य, धर्म और भाषा के भेदभाव के विकास का माहौल उपलब्ध किया जाएगा।
6. बीजेपी अपनी गलतियां सुधार लेगी
और
2014 का चुनाव देश के लिए देश के नाम पर लड़ा जाएगा।

Thursday, May 14, 2009

एक चुनाव देश के नाम पर ..................


क्या संभव है कि एक चुनाव केवल देश के नाम पर लड़ा जाये। परिवार, विरासत, जाति, साम्प्रदायिकता,भाषा , राज्य से हटकर हम देश की , देश के विकास की बात करें एक जाति और धर्म की नहीं भारतवासी की बात करें। आज किस पर भरोसा कर सकते हैं, कोई पारिवारिक विरासत के साथ चुनाव मे आता है तो कोई अपनी जाति और धर्म के बल पर। केवल आता ही नहीं है चुनाव जीतता भी है..........टीवी पर या सार्वजानिक सभा मे देश सेवा से चालू हो कर बिना रुकावट जाति धर्म के मुदे पर पहुचे बिना आज कोई चर्चा पूरी नहीं हो रही है। इस बार के चुनाव मे तो हर लक्ष्मण रेखा पार हुई है.... परिणाम वोटिंग प्रतिशत में ही साफ दिख रहा है। अभी तो मध्य है अंत बाकी है, कितनी बड़ी मंडी इस बार सजने वाली है या सज चुकी है। वो सेवा के नाम पर जीने मरने वाले इन राजनेताओ का चरित्र एक बार फिर सामने लायेगी।
बिलकुल मत मानना कि मैं निराश हूं ये देश मेरा है ....मैं निराश हो ही नहीं सकता हूं पर बात समाधान की करनी तो होगी। राजनीति का मतलब राज करने की नीति से है और राज कर्तव्य पालना से जुड़ा होता है..पर आज ये राजनीति केवल सत्तानीति मे तब्दील हो गई है ,जहाँ कर्तव्य नहीं अधिकार और ताकत प्रभावी है.यहाँ मैं इस परिस्थति के लिये राजनेताओ से ज्यादा, पढे लिखे उस तबके को ज्यादा दोषी मानता हूं, जो खुद अपने कर्तव्यो से दूर हो गया है। हमारा प्रभावी वर्ग अपनी बनाईं इस व्यवस्था का आनंद ले रहा है और बहुसंख्यक तबका अपनी रोजी रोटी की ही चिंता में लगा है। आज आपको नहीं लगता की जैसे जैसे हम आगे बढ़ रहे है जाति, धर्म की बात घटने की जगह बढ़ रही है। युवा राजनीति से दूर हो रहा है और राजनेताओ की नई पीढी विदेशों से पढ़ लिख कर राजनीति मे प्रवेश कर रही है। जिसे युवा राजनीति का नाम दिया जा रहा है, ये सब अकस्मात् नहीं है। अपने परिवार के भविष्य के लिये , राजनीति और देश के लिये हम मे निराशा व उदासीनता पैदा की जा रही है, अपना रास्ता बनाया जा रहा है ये आपको -हमको समझना होगा।
अपने देश की खातिर इस वर्ग पर अंकुश लगाने के लिये आगे आइये ,मैं राजनीति मे आने के लिये नहीं पर समाज मे अपनी प्रभावी भूमिका निभाने के लिये कह रहा हूं .... आप जहाँ है, जहाँ मौका मिले देश को जगाने की कोशिश करनी होगी ..वरना आलोचना का अधिकार भी हम छोड़ देगे। आप प्रयास प्रारम्भ कीजिये और विश्वास करना की एक चुनाव केवल देश के नाम पर देश के लिये लड़ा जायेगा।

Friday, May 8, 2009

जुगाड़ लालू का !!!!!!!!!!!




""प्रसिद्ध भारतीय आविष्कार "", लकडी के फ्रेम पर एक मोटर ,४ पहिये और एक स्टेरिंग -ब्रेक ......बन गया एक जुगाड़ .अभी तक सड़क पर ही चलते देखा था ना ,अब चलिये लालू की रेल पटरी पर भी देख लीजिये ....... , ये है लालू का जुगाड़ .रेवाडी के रेलवे स्टेशन पर....जब पहली बार देखा तो समझ नहीं पाया की ये है क्या ..गोर से देखने पर पता लगा कि ये तो तो जुगाड़ है ...रेल पटरी पर रोडी डालने के लिये इजाद किया गया है..








देख कर ताजुब भी हुआ ,गर्व भी और अफ़सोस भी ... ताजुब और गर्व इस लिये की ये पूरी तरह से भारतीय आविष्कार है और वह भी उन लोगो के हाथो से जिन लोगो ने किसी इंजीनियरिंग क्लास मे कभी प्रवेश भी नहीं लिया. अफ़सोस इसलिये की आज़ादी के 60 साल के बाद भी हम अपने हुनर का सम्मान करना नहीं सीख पाये है.,यदि जुगाड़ जेसी खोज भारत से बाहर हुई होती या किसी बडे कारपोरेट घराने की खोज होती ,तो क्या ये जुगाड़ ---जुगाड़ ही रहता ,शायद नहीं ..टाटा की नैनो की तरह शायद ये भी हिन्दुस्थान के मजदूरों , गाँवो मे काम करने वाले हजारो मिस्त्रियों को उनका सही मुकाम दिला पाता ......

Monday, May 4, 2009

प्रधानमंत्री .... हम भी है लाइन मे...

चुनाव का माहौल है.. राजनेता और उनके बयान भी बरसाती मेढ़क की तरह हर जगह हैं .....एक दूसरे पर अभूतपूर्व रूप से बेहतरीन शब्दों की बारिश की जा रही है। पर मैं इन "फूलो " या "बारिश " की बात नहीं करूंगा, कुछ बड़ी बात करते हैं.... बड़ी बात यानी प्रधानमंत्री, अभी तो प्रधानमंत्रियो की बाढ आई हुई है। हर कोई प्रधानमंत्री बनना चाहता है।
कल मेरे एक मित्र ने मुझ से पूछा की यार मंत्रियो को ही तो प्रधानमंत्री नहीं कहने लग गये हैं। समझ नहीं आ रहा है कि ये हो क्या रहा है। जब हम स्कूल में थे तो घर से कभी कभी 25-50 पैसे मिला करते थे, मेले मे जाने पर 2 से 5 रुपए। आज रोज 5-10रुपए और मेले मे 50-100 से कम में कोई बच्चा मानता ही नहीं है।.क्या मंत्री से प्रधानमंत्री भी ऐसा ही हो गया है। कैबिनेट, स्टेट लेवेल की तो बात छोड़ दीजिये कभी मंत्री ही बड़ी चीज थी। आज प्रधानमंत्री से कम मे कोई तैयार ही नहीं है। सांसद भले ही 10-15 हों, प्रधानमंत्री तो बनना ही है। कोई प्रधानमंत्री इन वेटिंग तो कोई राजकुमार का केयर टैकर, हर ग्रुप में एक नहीं 3-4 प्रधानमंत्री मौजूद हैं। लिस्ट भी है -अडवाणी, मनमोहन, राहुल गाँधी, नरेंन्‍द्र मोदी, मायावती, मुलायम, नीतीश, शरद पवार, करात, बुद्धदेव, चंद्रबाबू, नवीन पटनायक, जयाललिता और बहुत सारे घोषित -अघोषित भी अपने भाग्य के भरोसे हैं। क्या पता देवेगौडा और गुजराल की तरह किस्मत खुल जाए। 2009 में न सही तो 2014 में ही सही, वैसे आप को क्या लगता है कि अगला चुनाव 2014 में होगा........ मुझे तो नहीं लगता,
खैर अभी बात प्रधानमंत्री की........... ..तो भाई चुन लीजिये अपना प्रधानमंत्री आज नहीं तो कल, नहीं तो परसो कभी तो बन ही जाएंगे। वैसे तो उम्मीद पर ही दुनिया कायम है। पर एक बात यार............ हमारा नाम भी इस लिस्ट मे जुडवा दो हम तो 2014 के बाद के लिये भी तैयार हैं। बुरा मत मानो यार हम तो आप के नाम पर भी तैयार हैं।

Monday, April 27, 2009

प्रारंभ ............

प्रारंभ ............नई शुरुवात है ...कागज -कलम से हटकर ब्लोग्ग पर.राजीव के न्योते ,गौरव के छोकन की खुशबू मुझ को भी यहाँ ली आई है .नहीं जानता की "बीमे की समाजसेवा " के बीच से कितना समय निकाल पाउँगा . खैर ,अभी प्रारंभ है .. आस पास और दूर की बहुत सी बाते आप सब से बतियाने का नया माध्यम मिल गया है .तुलसीदास जी के शब्दों का ही उपयोग कर के सब सुर और असुर से आग्रह ,इस नये मुसाफिर पर कृपा कर अपनी टीका-टिपण्णी से ,आलोचना -समालोचना से प्रोत्साहन करते रहे ,ताकि ये नया मुसाफिर आप के साथ इस सफ़र पर चलता रहे................