Monday, June 22, 2009

हाँ मै हिन्दू हूँ


हाँ मै हिन्दू हूँ , मुझे गर्व है आदि सनातन धर्म का अनुयाई होने पर , मुझे गर्व है की मै विश्व की सबसे उदार , सहनशील और मात्रत्व भावः से विश्व बंधुत्व और हर प्राणी के हित की बात करने वाली इस महान सभ्यता का निवासी हूँ , और इस पर गर्व करते वक्त मुझे बिलकुल भी भय नहीं है कोई मुझे साम्प्रेदायिक कहै या संकुचित . मै हिन्दू हूँ ,
ताजुब होता है ना ,जब कोई इस धर्म को हिन्दू , सनातन , वैदिक या और किसी नाम से पुकारता है , यही से इसकी खूबसूरती चालु होती है , किसी भी धार्मिक पुस्तक मे हिन्दू शब्द भी नहीं है , फिर भी ये धर्म हिन्दू के नाम से जाना जाता है , कभी सिन्धु के पार रहने वालो को हिन्दू कहा जाता था और कभी क्या , कुछ सालो पहले तक हर भारतवासी को हिन्दू के नाम से ही जाना जाता था , ये वो परंपरा है जिस का नामकरण इस भूभाग से हुआ है , ये वो धर्म है जहाँ धर्म का अर्थ कर्त्तव्य पालन से है .
मै जानता और मानता भी हूँ की मेरे धर्म मे काफी बूराइया भी प्रवेश कर गई है , फिर भी मै गर्व करता हूँ की मै हिन्दू हूँ , मेरा धर्म अपनी बुराइयों पर चर्चा करने उन पर प्रश्न उठाने और उन्हे दूर करने का प्रयास करने की भी इजाजत देता है ,हाँ यहाँ मेरा मत बड़ा स्पष्ट है की ये बूराइया मूल धर्म मै नहीं बल्कि समय के साथ इसमे शामिल हुई है ( आगे की कडियों मे मै इस पर भी आऊंगा )
धर्म की सीधी सी परिभाषा है अपने कर्तव्यो की पालना , एक संतान के लिये माँ और पिता , एक विद्यार्थी के लिये गुरु , राजा के लिये देश और प्रजा किसी भी ईश्वरीय आराधना से पहले माने गये है , यदि हम अपने मूल कर्तव्यों की ही पालना करलें तो भी हिन्दू धर्म के अनुयाई के रूप मे हम चल सकते हैं .
ये मेरा धर्म कला , विज्ञान , स्वास्थ्य ( आयुर्वेद , योग ), गीत - गायन , शस्त्र विद्या ,नगर स्थापत्य , जैसे विभिन् गुणों और मानव विचार की हजारो विचारधाराओ को अपनी गोद मे फलने फूलने का मोका देता है
ये बहु देव , बहु पुस्तक , बहु विचारधारा का धर्म माना जाता है ,, काफी लोग इस पर इस धर्म की आलोचना भी करते है .. पर मे इसे जीवंत धर्म का सबसे बड़ा प्रमाण मानता हूँ , धर्म की साधना का मतलब इश्वर तक पहुचना है और मेरे धर्म का मत है की वो परमसत्ता इतनी उदार , विशाल ह्रदय है की जिस नाम से , जिस विधि से , जिस रूप मे हम उस को पुकारे वो हम को अपना लेता है , वो इतना निरंकुश या तानाशाह नहीं है अपने एक ही नाम , एक ही भाषा , एक ही विधि से हमारी पुकार सुनता हो , मै चाहूँ तो निराकार या साकार रूप मै , पुरुष रूप मै या स्त्री रूप मै , जीवंत गुरु या ग्रन्थ गुरु रूप मै , प्रकर्ति मे या ध्यान , मे उस परमपिता को पुकार सकता हूँ , माध्यम चाहे विधिविधान से पूजा हो , तप हो , गीत हो संगीत हो या मात्र अपने मूल कर्तव्यो की पालना हो ..
इसी लिये ये सनातन है , आदि अनादी है और जीवन्त धर्म है .

16 comments:

Sachi said...

Nice essay! Plese bring out some high lights of hindusim in a detailed manner, so that other can read and know!

mahashakti said...

सराहनीय पोस्‍ट

काफी अच्‍छा लगा पढ़ कर, काफी लोग अभी भी अंजान है, इस दिव्‍य दर्शन से।

Anonymous said...

good work !!!! Add some more details

GKK said...

tumne jo kuch likha hai wo ek satya hai jo aaj ki yuva generation nahi jaanti or jaha tak mera anubhav hai wo janna bhi nahi chahti. Hinduism hame har kisi se pyaar karna sikhata hai, karma sarvopari hai. Rashtradharm se badh kar kuch bhi nahi hai. lekin aisa kya kiya jaaye ki yuva logo ko apne ateet ki taraf joda jaaye jo ki is samay pizza, burgar, pubs and disco ke chakkar me padi hui hai. saath hi saath mai yeh bhi kahna chahunga jab tak ki hum apne samaaj ke ander ki buraiyo ka na khatam kar le tab tak hum ise har kisi ka priya nahi bana paayenge..

प्रशांत said...

प्रिय गौरव ,
आप की चिंता जायज है और सबसे बड़ा खतरा भी ये है , युवा वर्ग की दिशा आज बदल गई है इस मे बहुत सा दोष हमारी वर्तमान शिक्छा पद्धति का भी है , अपने धर्म की बुराइयों के बारे मे मैने स्वीकार भी किया है , इस पर भी मै आगे आने वाला हूँ , पर सबसे अच्छी बात है की हिन्दू धर्म इन बुराइयों पर प्रश्न उठाने , विरोध करने और उन्हे दूर करने की भी इजाजत देता है

महामंत्री - तस्लीम said...

अरे भई, धर्म तो धारण करने की वस्‍तु है, उसके लिए सबको बताने की जरूरत पडती है क्‍या।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

प्रशांत said...

जाकिर जी , बिलकुल सही कहा आपने , धर्म धारण करने के लिये है है ,पर ये वस्तु नहीं जीवन पद्धति है -परम्परा है -गौरव है और प्राणी मात्र से आगे बढ कर मनुष्य बनने की प्रक्रिया है ,और रही बात बताने की तो मित्र इस मे आपति क्या है ?

Sumit Bhargava said...

Prashant bhi bahut sahi lekha dharm ko sahi thrh se parbhashit kiya hai dharm wo hai jo hme sahi raha dikhye na k bhatkye dharm wo nahi jo dusro main dar pada ho tumne bahut acha lekha uske le thanks hme bhi garv hai k ham hindu hai or hindustan main rahne wala har praane hindu hai

Anil Pusadkar said...

ठीक लिखा।

मिहिरभोज said...

इसका मतलब मैं भी.......हिंदु ही हूं...

RAJ SINH said...

मैं आप में चिंतन की स्प्ष्ठ्ता देख रहा हूँ .और उसे कहने का गर्व भी .

@मिहिरभोज जी
हाँ आप भी हिन्दू हैं .यह धर्म ऐसा नहीं जहां किसी को दिक्सित होना पड़े . सम्पूर्ण मानव जाती हिन्दू है .

आप इश्वर को माने , ना माने , एक इश्वर माने , अनेक माने , कम पड़ जाये तो अपने इश्वर का निर्माण कर लें , अपनी आस्था और विश्वास के तहत या समझ जाएँ तो खुद को भी इश्वर कह लें . अहम् ब्रम्हाष्मी .

और समझना सिर्फ यह है की हम सभी प्रकृति के नियमों और उसकी शक्तियों से पूर्ण बद्ध हैं .फिर सम्पूर्ण विश्व के लिए , प्राणि मात्र के लिए , वही स्नेह प्रेम हो जो हम स्वयं अपने लिए अपेक्छा करते हों .

अगर कोई इश्वर है हम उसके ही अंश हैं , तो हम उसी की संतान हैं .लेकिन संतति की जिम्मेदारी का वहां भी हमारा कर्तव्य है .

@ GKK आप विचलित ना हों . पिज्जा , पब संस्कृति का हिंदुत्व की अवधारण से टकराव नहीं है , पारंपरिक संस्कृति से है .और वह किसी को हानी नहीं पहुंचाती तो हर्ज़ क्या है ? संस्कृतियों के माप दण्ड और मानक बदलते रहते हैं .

गीता में कहा ही है ....अगर पंचेंदियाँ सुख भोग के लिए न होतीं तो उसका निर्माण ही न करता मैं . उस पर नियंत्रण की बात भी . संतुलन भी .

बस हिंदुत्व का मर्म जाने युवा .

और हमारे यहाँ असहमति पाप नहीं है . सर काटने का प्रावधान नहीं है उसपर . बहुमत से असहमति होने पर भी हम ' चार्वाकों ' के सर नहीं कलम करते . उसे भी जीवन दर्शन ही मानते हैं और ' महर्षि ' का सम्मान भी देते हैं .

अगर कोई समझ ले तो हिंदुत्व आनंद , मुक्ति , मोक्छ सभी का द्वार है . मानव जीवन की सार्थकता और समन्वय का उद्घोष है मानव इतिहास के विचार दर्शन का आख़िरी पड़ाव .

प्रशांत said...

राज सिंह जी ,

मिहिरभोज के प्रश्न का उत्तर देने के लिये आभार ,
"अगर कोई समझ ले तो हिंदुत्व आनंद , मुक्ति , मोक्छ सभी का द्वार है . मानव जीवन की सार्थकता और समन्वय का उद्घोष है मानव इतिहास के विचार दर्शन का आख़िरी पड़ाव ." बहुत सही कहा आप नै , हिंदुत्व को समझने के लिये आप का ये कथन काफी महत्वपूर्ण है

आज यदि हमारा समाज और युवा वर्ग अपने हिंदुत्व को सही अर्थ मे समझ ले तो शायद हम अपनी समस्याओ के समाधान के साथ विश्व को एक आदर्श नेत्रत्व दे सकते है , पर आज हिंदुत्व के नाम पर कही भय तो कही रूढी वादी परम्परा प्रचारित की जा रही है , जरूरत है इस का समाधान निकालने की ,
--

RAJ SINH said...

हाँ प्रशांत . आपने ठीक पहचाना . दुनिया में जितने भी जीवन दर्शन हैं उनकी मीमांसा कर लें आप अपने निष्कर्स पर और दृढ हो जायेंगे . और हमने हजारों साल पहले ही कह दिया था .' वसुधैव कुतुम्बुकम ' .

और हमारी मानवीयता की गंगा की गंगोत्री का उद्गम
' सर्वे भवन्तु सुखिनः ' में देखा जा सकता है .
आपजो हिंदुत्व के नाम पर देख रहे हैं , वो तो विकृतियाँ हैं . जो इस गंगा को मैली ही नहीं विषाक्त भी कर चुकी हैं .इन्हीं से तो संघर्ष है .

और यह विग्रह के बिना ही संभव हो ,मन में यह इच्छा रहे.हमारी परंपरा है संवाद की विवाद की नहीं . हमारे शास्त्रार्थ संवाद की परंपरा थे . विवाद के नहीं . इसीलिये हिंदुत्व ही है जो तार्किकता की कसौटी पर ज्यादा खरा है , सिर्फ आस्था और विश्वास ही नहीं है.

.आप सावरकर आंबेडकर और लोहिया को पढें तो आपके विचारों को संबल नहीं बल मिलेगा ..

और हमारी सबसे बड़ी विकृति है हमारी जातिगत सच्चाई .जाती कानाश किये बिना हिंदुत्व के बारे में सोचा भीनहीं जा सकता . और
नयी पीढी की नयी चेतना ही इसका नेत्रित्व करे .

.

Aashu...:) said...

Bahut badiya dada...

Anonymous said...

धर्म का अर्थ - मानव समाज में सत्य, न्याय एवं नैतिकता (सदाचरण) ।
व्यक्तिगत धर्म- सत्य, न्याय एवं नैतिक दृष्टि से उत्तम कर्म करना, व्यक्तिगत धर्म है ।
सामाजिक धर्म- मानव समाज में सत्य, न्याय एवं नैतिकता की स्थापना के लिए कर्म करना, सामाजिक धर्म है । ईश्वर या स्थिरबुद्धि मनुष्य सामाजिक धर्म को पूर्ण रूप से निभाते है ।
धर्म संकट- सत्य और न्याय में विरोधाभास की स्थिति को धर्मसंकट कहा जाता है । उस स्थिति में मानव कल्याण व मानवीय मूल्यों की दृष्टि से सत्य और न्याय में से जो उत्तम हो, उसे चुना जाता है ।
धर्म को अपनाया नहीं जाता, धर्म का पालन किया जाता है । धर्म के विरुद्ध किया गया कर्म, अधर्म होता है ।
व्यक्ति के कत्र्तव्य पालन की दृष्टि से धर्म -
राजधर्म, राष्ट्रधर्म, मनुष्यधर्म, पितृधर्म, पुत्रधर्म, मातृधर्म, पुत्रीधर्म, भ्राताधर्म इत्यादि ।
धर्म सनातन है परमात्मा शिव से लेकर इस क्षण तक व अनन्त काल तक रहेगा ।
धर्म एवं ‘उपासना द्वारा मोक्ष’ एक दूसरे आश्रित, परन्तु अलग-अलग विषय है । ज्ञान अनन्त है एवं श्रीमद् भगवद् गीता ज्ञान का सार है ।
राजतंत्र में धर्म का पालन राजतांत्रिक मूल्यों से, लोकतंत्र में धर्म का पालन लोकतांत्रिक मूल्यों से होता है ।
कृपया इस ज्ञान को सर्वत्र फैलावें । by- kpopsbjri

Anonymous said...

वर्तमान युग में पूर्ण रूप से धर्म के मार्ग पर चलना किसी भी आम मनुष्य के लिए कठिन कार्य है । इसलिए मनुष्य को सदाचार एवं मानवीय मूल्यों के साथ जीना चाहिए एवं मानव कल्याण के बारे सोचना चाहिए । इस युग में यही बेहतर है ।